20 नवंबर 2020 - 17:46
दुनिया भर के 13 देशों में तुर्की की सेना की उपस्थिति, क्या है लक्ष्य?

वैसे तो दुनिया के कुछ हिस्सों में तुर्की की सैन्य उपस्थिति नाटो के मिशन का हिस्सा है, लेकिन हाल के वर्षों में बिना अनुमति के कई देशों तुर्क सेना की उपस्थिति और विदेशी धरती पर अपने सैन्य ठिकानों को स्थापित करने का प्रयास तुर्की का अब एक लक्ष्य बनता जा रहा है।

समाचार एजेंसी तसनीम की रिपोर्ट के मुताबिक़, तुर्की की संसद ने इस देश की सेना की आज़रबाइजान में तैनाती को लेकर बिल पास कर दिया है। अब अंकारा और मास्को के बीच अंतिम समझौते और कुछ तकनीकी विवरण की जांच के बाद तुर्की आज़रबाईजान अपने सैनिकों को भेजना शुरू कर देगा। इस बीच ऐसी भी ख़बरें आ रही हैं कि तुर्की ने अपने सैनिकों की एक टुकड़ी पहले ही आज़रबाइजान रवाना कर दी है। पिछले दस वर्षों में हमेशा तुर्की के 70 से 100 सैन्य अधिकारी आज़रबाइजान गणराज्य में तैनात थे, लेकिन अब यह तय पाया है कि कि, आज़रबाइजान में तैनात होने वाले तुर्क सैनिकों की संख्या कई बराबर कर दी जाए। तुर्की की संसद में आज़रबाइजान में सैनिकों की तैनाती को लेकर पास हुए बिल को अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में कोई ख़ास जगह नहीं मिली है, लेकिन इस बीच एक ऐसा विषय है जिसको लेकर तुर्की की जनता, मीडिया और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया बहुत ज़्यादा चर्चा कर रही है। यह विषय है कि तुर्की के शस्त्र बल इस समय कौन-कौन से देशों में में तैनात हैं और उसका क्या लक्ष्य है।?

यह विषय इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाल के दिनों में तुर्की की अर्थव्यवस्था अच्छे दौर से नहीं गुज़री रही है। इस समय तुर्की में युवाओं की एक बहुत बड़ी संख्या है जो बेरोज़गारी की समस्या से जूझ रही है। ऐसी स्थिति में दूसरे देशों में सेना की तैनाती देश पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रही है, जिसकी वजह से इस देश के आम लोगों में चिंता है और समय-समय पर वह इसके विरोध में आवाज़ें भी उठती रहती हैं। लेकिन सच यह है कि तुर्की के राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया हलके में इस पर किसी भी तरह की कोई गंभीर आपत्ति नहीं पाई जाती है। इस समय तुर्की के सैनिक एशिया, यूरोप और अफ़्रीक़ा जैसे दुनिया के 3 महाद्वीपों के 13 देशों में उपस्थिति हैं। अमेरिका के बाद तुर्की दुनिया का वह देश है जिसके सैनिक दुनिया की लगभग सभी कोनों में तैनात हैं। 13 देशों में साइप्रस का तुर्क बहुल क्षेत्र, अफ़ग़ानिस्तान, लेबनान, कोसोवो, बोस्निया, अल्बानिया, सीरिया, इराक़, लीबिया, सोमालिया, क़तर, पाकिस्तान और आज़रबाइजान गणराज्य शामिल हैं।

वहीं हाल के दशकों में नाटो की सदस्यता तुर्की के लिए राजनीतिक और रक्षा के लिहाज़ से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। कुछ टीकाकारों का मानना है कि, नाटो की सदस्यता तुर्की के लिए कोई ख़ास लाभदायक नहीं रही है। बल्कि इसने तुर्की और पूर्वी दुनिया के देशों के बीच खाई पैदा करने का काम किया है। नाटो की सदस्यता ने कई दशकों से तुर्की के सैन्य वैज्ञानिकों, अधिकारियों और इस देश के रक्षा उद्योग को नाटो पर निर्भर कर रखा है। बल्कि इसने तुर्की में कुछ सुरक्षा कमियों को भी जन्म दिया है और साथ ही इसके कारण नाटो की तुर्की के कई संवेदनशील मुद्दों में घुसपैठ भी हुई है। लेकिन इसके मुक़बाले में कुछ अन्य टीकाकारों का मानना है कि, नाटो की सदस्यता तुर्की के पक्ष में रही है, जो इस बात का कराण बनी है कि तुर्की पश्चिमी देशों के बहुत नज़दीक पहुंच गया है और यही वजह है कि आज तुर्की क्षेत्रीय और वैश्विक संतुलन बनाए रखने में सक्षम है और ठीक काम कर रहा।

कुल मिलाकर इस समय तुर्की में दो दशकों से जो पार्टी सबसे ज़्यादा शक्तिशाली है वह सत्ताधारी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी है, जिसका नेतृत्व रजब तय्यब अर्दोग़ान कर रहे हैं। यह पार्टी दो दशकों से प्रभावशाली प्रेस और मीडिया के विशाल सिस्टम का उपयोग करके अपने हाथों में शक्ति बनाए रखने में कामयाब रही है। लेकिन हालिया दिनों में देखा गया है कि यह मीडिया अब धीरे-धीरे जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी के लिए सिर दर्द खड़ा करता जा रहा है। इसलिए नहीं कि यह मीडिया पार्टी की नीतियों से नाराज़ है बल्कि इसलिए कि इसने दुनिया भर में तुर्की सेना की उपस्थिति को अब एक नए रुख से पेश करना शुरू कर दिया है। तुर्की के कुछ प्रसिद्ध समाचार पत्र आज कल लगातार इस बात का उल्लेख कर रहे हैं कि, तुर्की बहुत जल्द उसमानी ख़िलाफ़त या ओटोमन ऐम्पायर को ज़मीनों को वापस ले लेगा। तुर्की के मीडिया द्वारा इस तरह के शीर्षक के साथ आने वाली रिपोर्टों को देखकर दुनिया भर के कई जानकारों का कहना है कि, ऐसा लगता है कि तुर्की की नज़रें उसमानी ख़िलाफ़त या ओटोमन ऐम्पायर वाले दौर पर लगी हुई हैं और वह देश के भीतर बड़े बदलाव करने के साथ ही बड़े योजनाबद्ध रूप से अपनी भौगोलिक सीमाओं के विस्तार की कोशिश में लग गया है।